Wednesday, December 7, 2016

ईमानदारी

बाहर की दुनिया में
लहरा दिया पताका
निर्विरोध
अपनी ईमानदारी का !
बेदख़ल कर दिया अपनों ने
रिश्तों से,
घरों औ' देहरियों से
पलक झपकते ,
गुमां हो चला था उन्हें
मेरी शरारत
बेनक़ाब कर देगी उन्हें!

Tuesday, October 11, 2016

दशहरा

दशहरा और विजयदशमी की आप सबों को हार्दिक शुभकामना. एक प्रबुद्ध व्यक्ति ने सन्देश प्रेषित किया कि रावण के व्यक्तित्व में कई सकारात्मक अवयव भी हैं जिन पर प्रायः चर्चा नहीं हो पाती. निश्चय ही यह सत्य है परंतु ऐसा तो हर मामले में होता है. व्यक्ति गुण-दोषों का पुंज है परंतु उसकी ख्याति अथवा कुख्याति इस बात पर निर्भर है कि उसका कौन सा पक्ष प्रभावी है. यह मान बैठना कि नायक में सिर्फ और सिर्फ सदगुण हों और खलनायक केवल दुर्गुणों की खान हो , तर्कसंगत नहीं होगा. हमारे आज के समाज में भी रॉबिन हुड जैसे कई चरित्र हैं जो पुष्पित-पल्लवित हो रहे हैं. लोकतंत्र के राष्ट्रीय और प्रादेशिक मंदिरों  में अनेकानेक ऐसे माननीय हैं जिनके विरुद्ध संगीन मामले लंबित हैं परंतु लोक में अपनी प्रसिद्धि और प्रस्तुति के दम पर वे उन नियमों की पुनर्व्याख्या कर सकने की स्थिति में हैं जिनकी बदौलत वे दागी साबित हुए......... खैर समय आत्मावलोकन करने का है.......मैं अपने अंतस के कलुष, कटुता और दर्प का शमन आज कर सकूं तो दशहरा की सार्थकता मेरे लिए बनी रहेगी.  

Monday, September 5, 2016

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ . जीवन पथ पर मुझे शिक्षित- दीक्षित करने में  सहयोगी रहे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ. सर्वश्रेष्ठ शिक्षक के रूप में अपने पिता को देखने का सौभाग्य प्राप्त है मुझे. उन्हीं का अनुकरण करने की चेष्टा करता हूँ और आंशिक रूप से ही सही, सफल भी हो रहा हूँ शायद...........

Saturday, September 12, 2015

हिंदी दिवस

   चौदह सितम्बर का सरकारी कैलेंडर में विशेष महत्त्व है.  हिंदी को प्राणवायु देने के लिए हर कार्यालय, हर प्रतिष्ठान एक आडम्बरपूर्ण अनुष्ठान का आयोजन करता है, प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, कुछ नए सांख्यिकीय आंकड़े गढ़े जाते हैं और फिर हिंदी को एक असहाय वृद्धा की तरह अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है. इन अनुष्ठानों का शृंगारिक औचित्य मात्र है क्योंकि राजकीय प्रश्रय ने हिंदी का भला तो बिलकुल नहीं किया है. हाँ, इतना अवश्य हुआ कि एक सर्वांग स्वस्थ शिशु माता-पिता के अतिशय लाड़ की वजह से गोद में ही पड़ा रह गया और उन लक्ष्यों को पाने की कोशिश भी नहीं कर सका जिन्हें पा लेना उसके लिए एकदम आसान होता. 
    बॉलीवुड और वैश्वीकरण से उपजे बाजार तथा सर्वव्यापी-सदैवव्यापी मीडिआ ने  हिंदी भाषा को वास्तविक अर्थों में सशक्त-समृद्ध किया है.  बाजार और सिनेमा के झंझावातों ने हिंदी को न केवल कठिनाइयों-अड़चनों से जूझने की ताकत दी वरन एक खास किस्म का लचीलापन भी दिया जिसकी वजह से अधिकाधिक नए शब्दों को अपनाने की सदाशयता हिंदी में आ सकी. संस्थाओं और मठाधीशों के शुद्धिकरण के आग्रह के उलट सुगम-सहज-सुबोध बनने की हिंदी की इसी चाहत ने इसे हर वर्ग में लोकप्रिय बनाया. प्रधानमंत्री का यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि डिजिटल दुनिया में हिंदी तीन प्रमुख भाषाओँ में से एक होगी.
 मेरी मानें तो हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नौनिहालों को प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने की है. तत्पश्चात माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में हिंदी को प्रतिनिधि स्थान देने की बड़ी चुनौती होगी. मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि दक्षिण भारत के लोगों में द्वितीय-तृतीय भाषा सीखने की ललक व योग्यता उत्तर भारतीयों की अपेक्षा अधिक होती है. ऐसे में हिंदी को विभिन्न पाठ्यक्रमों में शामिल करना कठिन नहीं होगा बशर्ते कि इस कदम के लाभ से समाज के सभी वर्ग को भली-भांति परिचित करा दिया जाये.

                                                                ~ नीरज पाठक 
                                                                   जी- 453 -सी, राज नगर- II, 
                                                                   नयी दिल्ली- 110077.


Monday, June 22, 2015

रेत के कण

बचपन में दुर्गा पूजा की प्रतीक्षा बड़ी बेसब्री से करते रहते थे हम. नवमी के दिन नए सिले कपड़े मिलते थे और उन्हें धारण कर हम सभी भाई बहन रिक्शा पर घूमने जाते थे ......रात के एक डेढ़ बजे तक सभी पंडालों में जा प्रतिमा दर्शन  का कार्य संपन्न कर लेने की बाध्यता होती थी क्योंकि अगले दिन विसर्जन होना होता था. एक अलौकिक वातावरण का निर्माण होता था और समाज के सभी तबके के लोग , स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े ....बड़े उत्साह के संग उत्सव में सम्मिलित होते थे . ३०-३५ साल पहले के छोटे शहर की ऐसी कई यादें बरबस कुरेदती रहती हैं, नास्टैल्जिया के भाव रचती रहती हैं . भौतिक प्रगति के प्रतीक चिह्न हममें से अधिकांश लोगों की जिंदगी में नहीं होते थे उस वक्त. हमारी छोटी छोटी हसरतें हुआ करती थीं और उन हसरतों का पूरा हो जाना हमें न केवल रोमांचित करता था वरन एक बादशाहत सी अनुभूति भी देता था . टिफिन(भोजनावकाश) के दौरान बाबूजी से मिलनेवाली चवन्नी मेरे बाल मन में सम्पन्नता की कहानी लिखती थी .......मोहन चाट वाला अपने चटपटे व्यंजनों  के साथ स्कूल के गेट पर इंतजार कर रहा होता , घंटी बजी नहीं कि बच्चे पूरी शक्ति के संग जयघोष करते एक-दो-तीन......गोल-गप्पे,चाट-पापड़ी,आइस क्रीम , इमली, पाचक.....हर ठेले पर भीड़ .............आनंद की वह अनुभूति  मुझे मैक डी और पिज़्ज़ा हट में दिखाई नहीं देती.  भीड़ की पहुँच से दूर होकर आज के मानव ने अपने लिए ऐश्वर्य के छोटे छोटे अभेद्य दुर्ग बना लिए और पैसे से खरीदी जाने वाली तमाम चीजें इकट्ठी कर ली . हमने अपने और अपने कुटुंब के लिए निजी उत्सव गढ़ लिए . सामुदायिकता से आने वाली पसीने की बू  और संक्रामकता ने हमें घोर स्वच्छतावादी बना दिया. हमारी मुट्ठी से रेत के ढेर सारे कण निकल गए , जिंदगी की इस छोटी पारी में उन कणों को सहेजने का जतन करना जरुरी है.

Wednesday, February 11, 2015

परिणाम के निहितार्थ

आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने चुनाव विश्लेषकों, राजनीति शास्‍त्रियों और सार्वजनिक स्थलों पर अपनी पैनी नज़र व लम्बे अनुभव को प्रदर्शित करने वाले असंख्य राजनीतिक पण्डितों के समक्ष एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है।ऐसा भी होगा इसका इल्म किसी को नहीं था। ' आप ' के पक्ष में ऐसी कोई आँधी भी दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी।कुछ लोग तो उनकी             ' नौटंकी ' के विरुद्ध मुखर हो रहे थे।
   भाजपा और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। केन्द्र में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद चार राज्यों में प्राप्त होने वाले विजय ने मद की मात्रा बढ़ा दी और प्रयोगधर्मिता सर चढ़ कर बोलने लगी। जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं और दशकों से पार्टी  के चेहरे रहे स्थानीय नेताओं को नज़रअंदाज़ कर सीईओ  की तरह सरकार चलाने हेतु किरण बेदी को सामने लाने का 'मास्टर स्ट्रोक' आत्मघाती साबित हुआ। चाल ,चरित्र और चेहरा की बात करने वाली 'पार्टी विथ ए डिफरेंस ' ने चेहरा प्रत्यारोपित करने की संस्कृति शायद अपनी धुर विरोधी पार्टी से आयात किया होगा। और मेरी मानें तो शायद इसी कदम ने सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। जब आप निष्ठा और प्रतिबद्धता को प्रताड़ित करने की कोशिश करते हैं तो आपके अपने लोग उदासीन और निष्क्रिय हो जाते हैं , संस्था से उनका जुड़ाव या सम्बद्धताबोध शनैः -शनैः कम हो जाता है।  
   कांग्रेसी नेतृत्त्व , बेमन से ही सही ,सत्ता में वापसी की घोषणा करती रही और चूँकि वह अपने प्रदर्शन और परिणामों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थी इसलिए उसने बड़े-बड़े , थोथे व अवास्तविक वायदों से भी कोई परहेज़ नहीं किया। 
रोज कमाकर रोज खाने वाली दिल्ली की बहुसंख्यक जनता ने धन , वैभव , शक्ति, अहंकार और नकारात्मकता की ' खास ' शैली को नकार कर सरलता, बेचारगी और अपनत्व दिखाने वाली ' आम ' शैली को अंगीकार किया है तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसके गूढ़ अर्थ हमें ढूँढ निकालने होंगे। लोकतंत्र में लोक की महत्ता को पुनर्स्थापित करने की चुनौती सबसे बड़ी है।  
   ऐसा क्या हुआ कि  बवाना से बदरपुर और नजफ़गढ़ से शाहदरा तक के मतदाताओं ने एक दूसरे के दिल की आवाज़  सुन ली  और चहुँदिश एक ही पैटर्न में वोट डले ? मतदान प्रारम्भ होने से एक घण्टे पूर्व ही अधिकांश केन्द्रों पर लगी लम्बी कतारें किस बेचैनी, आतुरता और हलचल को इंगित कर रही थीं ? छले जाने और ठगे जाने की बारम्बारता ने ही शायद इन निरीहों -निहत्थों में ऐसी आक्रामकता दे दी थी कि इन्होंने इतिहास रच डाला !
कहते हैं कि ईश्वर जब जिम्मेवारी देते हैं तो कन्धों की मज़बूती देखते हैं। अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों के ऊपर बहुत बड़ा दायित्व आन पड़ा है।  अपने पाँच वर्ष के कार्यकाल में अगर उन्होंने बिजली -पानी -स्वच्छता जैसे बुनियादी मुद्दों पर लोगों को राहत दी और निजी स्कूलों ,निजी अस्पतालों , नगर निगम व पुलिस की अवैध उगाही पर अंकुश लगा दिया तो न केवल उनका नाम स्वर्णाक्षरों  में लिखा जायेगा बल्कि उनके समक्ष उनके प्रतिद्वंद्वियों का टिकना भी मुश्किल हो जाएगा। 

                                                                                                                                   ~  नीरज पाठक  


Friday, September 5, 2014

गन्तव्य

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं। एक अनुशासित छात्र हूँ इसलिए शिक्षकों की महत्ता को समझता हूँ। छात्रावस्था को पार करने के बाद भी सीखने की ललक बरकरार है और मैं यह दृढ़तापूर्वक मानता हूँ कि जिज्ञासु होना जीवन्तता की निशानी है। यानि हमें अंतिम सांस तक लर्निंग मोड में रहना चाहिये। एक छोटे कस्बाई शहर के सरकारी विद्यालय-महाविद्यालय की अपनी यात्रा में मैंने कई ऐसे शिक्षकों को देखा-महसूसा है जो अपनी व्यक्तिगत परेशानियों-त्रासदियों को पूरी तरह नज़र अन्दाज कर छात्रों को गढ़ने के अपने कर्म-पथ पर अविचल चलते रहे। अल्पवेतनभोगी उन महामानवों ने कर्तव्यपरायणता और निष्ठा के पाठ पोथियों से नहीं वरण अपने आचरण से पढ़ाए..........इस जन्म में उस ऋण से उऋण होना मेरे लिए मुश्किल होगा शायद!
 कालांतर में महानगर का प्रवासी होना पड़ा और मित्रों-सहकर्मियों-वरिष्ठ अधिकारियों-अधीनस्थों से सीखने के कई-कई मौके मिले, मिलते ही जा रहे हैं। मैं रोज अपने को समृद्ध होता पाता हूँ। जीवन की प्रतिकूलताएं भी एक अक्खर मिज़ाज शिक्षक की तरह आपको बहुत कुछ सिखला जाती हैं। ईश्वर की कुछ ऐसी रचना होती है कि वो आपको एकदम से घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं। प्रार्थना की स्थिति में ला देते हैं आपको। विनीत और विनम्र बनाने का उनका यह प्रयोग हर व्यक्ति पर सफल नहीं हो पाता परन्तु अधिकांश व्यक्ति निश्चित तौर पर इस प्रक्रिया से परिमार्जित हो जाते हैं। व्यक्ति को समर्थ, सबल और परिपक्व बनाने में परिवार,समाज और परिस्थितियों का बहुत बड़ा योगदान होता है। मैं अपने को बहुत ही सौभाग्यशाली मानता हूँ कि माता-पिता और अग्रजों  से ऐसे मूल्य मिले जो संतुलित जीवन जीने और संवेदनशील जीवन-दृष्टि के लिये अनिवार्य है। इस मशाल को अगली पीढी तक हस्तान्तरित करने का कार्य बहुत चुनौती भरा है। और हम  में  से कई सारे लोग इस मुद्दे पर असहाय नज़र आते हैं। चकाचौंध मचाने वाली बहुत सारी चीजें अचानक हमारी जिन्दगी में पैर पसारने लगीं और हम उनके औचित्य को समझे बिना अंधानुकरण  करने लग गए। आधुनिकता और स्वेच्छाचारिता के बीच की महीन परत को हमने अनायास ही मिट जाने दिया है। और इस दिशा में हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए , हमने शिक्षा के बाजारीकरण हेतु अपनी खिड़कियों-दरवाजों को खोल दिया। विद्या-मंदिरों को शॉपिंग मॉल बना डाला।ऐसी व्यवस्था को जन्म दे दिया जिसमें शिशु  के गर्भस्थ रहते ही विद्यालय-प्रवेश की चिन्ता, योजना और दौड़-भाग होने वाले माता-पिता की आँखों की नींद छीन ले। आईए , शिक्षक दिवस के इस पुण्य अवसर पर थोड़ा सा आत्म-चिन्तन कर लें ---------आखिर पहुँचना कहाँ है हमें?
                                                                                   ~ नीरज पाठक

Friday, August 15, 2014

विरोधाभास

माँ के इलाज़ के क्रम में एम्स, दिल्ली में हूँ। भारत की विविधता और अनेकता में एकता की स्पष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है यहाँ। सैकड़ों परिवारों को प्रतिदिन आरोग्य और खुशी का उपहार मिलता है। डॉक्टरों की निष्‍ठा और प्रतिबद्धता अनुकरणीय है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी यहाँ आकर अपने को सुरक्षित हाथों में पाता है। निस्संदेह एक आदर्श सरकारी संस्थान ऐसा ही होना चाहिये। यहाँ हरेक वॉर्ड, हरेक बेड पर मानवीय सम्बंधों की अनूठी कहानियाँ विचरती हैं। पूसा, समस्तीपुर से आया राकेश (बदला हुआ नाम) अपने समवयस्क पड़ोसी की तीमारदारी के लिये कूच विहार की अपनी 6000/- की नौकरी छोड़ आया है तो वहीं देवरिया का इरफ़ान अपनी भाभी की सेवा में दो महीने से लगा है। भाई नौकरी छूट जाने की विवशता के कारण नहीं आ पाया अपनी पत्‍नी के साथ .........................छोटा स्टोव, एक दरी और जरूरी सामानों की एक गठरी के साथ खुले आसमान के नीचे समय गुजारते दम्पतियों - परिवारों के चेहरों की हताशा उनकी आँखों में छिपी आशा की किरणों को विचलित नहीं कर पाती, इसके पीछे कहीं न कहीं एक-दूसरे के प्रति जीने-मरने का उनका संकल्प और ईश्वर में उनकी गहरी आस्था है।खर्चने को बहुत कुछ न होने के बावज़ूद देने को शुभकामना और सद्‌भावना का एक असीम भण्डार है उनके पास जो उन्हें सह-अस्तित्व के सिद्धांतों में विश्‍वास करना सिखाता है। ये उन क्षेत्रों से आने वाले लोग हैं जो विकास और प्रगति के विभिन्न प्रतिमानों पर खड़े नहीं उतरते परंतु सामाजिक और पारिवारिक सरोकारों के मामले में समझौता नहीं कर पाते। और शायद इसीलिये विकास के मानदंडों पर फिसलते चले जाते हैं। महानगरों के वृद्धाश्रमों में गुंजायमान सिसकियाँ अनेकानेक उच्‍चपदस्थ सन्तानों की कहानियाँ कह जाती हैं।

स्‍वतंत्रता दिवस

प्रधानमंत्री के भाषण ने नई ऊर्जा और स्‍फूर्ति का संचार किया। ऐसा लगा मानो कोई मेरी भावना और वेदना को शब्द दे रहा हो। प्रजा की दिक्कतों को महसूस करना और उनके निवारण की चिंता करना प्रभावशाली नेतृत्व का परिचायक है। संवाद जीवंत हो तो उसकी सार्थकता बनी रहती है और अच्छे परिणाम भी आते हैं। परंपरा के निर्वाह के लिये बोझिल उद्‌बोधनों को सुनने की बाध्यता समाप्त हो चली, एक शुभ संकेत है। प्रबंधन के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब बदलाव लाने की इच्छा-शक्ति दिखाता है तो उसका प्रभाव संस्था के निचले पायदानों तक स्वत:दिखने लगता है। हम सभी जहाँ कहीं जिस रूप में हों, अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह पूरी ईमानदारी व निष्‍ठा से करें तो भारतमाता का गौरव अक्षुण्ण रहेगा। जय हिंद ! जय भारत !!

Monday, June 23, 2014

मीडिया की नैतिकता

भारतीय मीडिया और विशेषकर हिन्दी मीडिया नैतिकता के तकाजों से कोसों दूर रहकर चलनेवाली पथभ्रष्ट दुकान है। सनसनीखेज़ और चटकारेदार खब़रों को कामुकता की चासनी में लपेट कर परोसना ही इनका ध्येय है। हमारे दैनिक जीवन की आपाधापी, माफ़िया, वसूली करते पुलिसकर्मी व टीटीई, निज़ी प्रेक्टिस करते सरकारी शिक्षक व डॉक्टर, सड़क पर फैले बदबूदार कचरे पर खेलते बच्चे , ज़हरीली गैसों और द्रवों का उत्सर्जन करते उद्योग , दवा और दूध में मिलावट करते व्यवसायी हमारी मीडिया के कैमरों की पकड़ में आते ही नहीं। ब्रेकिंग न्यूज़ बनने की योग्यता शायद इन खब़रों में है ही नहीं!