२४ सितम्बर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने को है और सियासी पार्टियों ने अपनी-अपनी रोटी सेंकनी शुरू कर दी . अल्ला और ईश्वर के नाम पर लड़ी जाने वाली इस लड़ाई के शिकार न तो हमारे बड़बोले नेता बनते हैं और न ही नामी-गिरामी हस्तियाँ. रोज कमाकर रोज खाने वाली जनता ही इन हादसों का शिकार बनती है. इस बार भी फसाद की इस आग को पूरे भारत में फैलता देखने की हसरत लिए कई लोग खड़े हैं .विभिन्न पार्टियों ने भी परस्पर विरोधी स्टैंड ले लिया है. ये वही पार्टियाँ हैं जिन्होंने कुछ ही दिन पहले अपने सारे मतभेद भुलाकर सांसदों की तनख्वाह बढवा ली थी.चलिए,कोई एक मुद्दा तो है जिस पर इनमे मतैक्य होता है! राष्ट्रीय एकता और अखंडता की परवाह तो बाद में भी की जा सकती है. परन्तु इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए मैं नेताओं को दोषी नहीं मानता हूँ. दोषी जनता है, हम आप हैं. सड़क नहीं, स्वास्थ्य नहीं, शिक्षा नहीं, सुरक्षा नहीं, रोजगार नहीं, बिजली नहीं ..................आदि-आदि समस्याएं हमें उद्वेलित-उत्तेजित करने में सर्वथा असमर्थ हैं. सरकारी गोदामों मे सड़ते अनाज भूख से होने वाली मौतों को रोकना नहीं चाहते. हमारी दो सौ वर्षों की गुलामी को महिमामंडित करनेवाले राष्ट्रमंडल खेलों पर पानी की तरह बहाए जानेवाले हजारों करोड़ रूपये बेहतर उद्देश्यों पर खर्च नहीं किये जा सकते थे. दस दिनों की दीवानगी के इस 'राष्ट्रीय-पर्व' में विदेशों से जो महा-मानव आयेंगे उनकी दिलचस्पी खेलों-खिलाडियों में नहीं बल्कि दिल्ली के भिखारियों और दूसरी 'असुंदर' चीजों मे होगी इसीलिए इन सारी न देखने लायक चीजों को भगाया-छिपाया जा रहा है. ये और इनसे मिलते-जुलते सैकड़ों प्रश्न ऐसे हैं जो हमें अधीर कर सकते थे परन्तु हमने शायद अपनी धमनियों में रक्त की जगह दिल्ली की यमुना का जल भर लिया है.
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